बालक की शिक्षा में पालक का योगदान

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बालक

परिवार, बालक के विकास की प्रथम पाठशाला है। यह बालक में निहित योग्यताओं एवं क्षमताओं का विकास करता है। परिवार का प्रत्येक सदस्य, बालक के विकास में अपना  योगदान देता है। 

परिवार सबसे पुराना और मौलिक मानव समूह है। पारिवारिक ढांचे का विशिष्ट रूप एक समाज के रूप में समाज में विभिन्न हो सकता है और होता है पर सब जगह परिवार के मुख्य कार्य हैं- बच्चे का पालन करना, उसे समाज की संस्कृति से परिचित कराना, सारांश में उसको शिक्षित और  उसका सामाजिकरण करना।” 

माता पिता  बालक की प्रथम पाठशाला होते  है। बालक  घर में वो सभी गुण प्राप्त कर सकता है। जिसकी पाठशाला में आवश्यकता होती है । बालकों को घर पर ही नैतिकता एवं सामाजिकता का प्रशिक्षण मिलता है। सामाजिक तथा अनुकूलन के गुण विकसित करता है। पालक ही सामाजिक तथा अनुकूलन के गुण विकसित करता है। सामाजिक,नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करने में परिवार  का योगदान मुख्य है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है ।  

वर्तमान में बच्चों में जीवन जीने के तरीके  में बहुत ज्यादा बदलाव आ गया है। आज का नागरिक अपना जीवन अपने अंदाज में ही व्यतीत करना चाहता है। इसमें वह  किसी का भी हस्तक्षेप करना उसे बिल्कुल पसंद नहीं करता है। इस जीवन जीने की कला में वह अपनी जिम्मेदारियों से भागने  का भी प्रयास कर रहा है। इसका प्रतिकूल प्रभाव परिवार और समाज पर पड़ रहा है। विशेषकर अभिभावकों ओर शिक्षकों का मार्गदर्शन बच्चों के जीवन जीने की शैली को बहुत हद तक प्रभावित करता है। हमें उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाते हुए परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति उनके दायित्वों के प्रति भी जागरूक करना होगा। ऐसा नहीं करते हैं तो युवा पीढ़ी अपने जीवन और उनके दायित्वों के बारे में कभी भी  जिम्मेदार नहीं हो पाएंगे।

आज के समय में  विद्यार्थियों के जीवन की शैली में जो बड़ा परिवर्तन आया है वह सबसे अधिक संस्कारों का है। आज का विद्यार्थी मेधावी, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में बहुत अधिक रुचि रखता है लेकिन सुसंस्कारित नहीं है। अच्छे संस्कारों की कमी के कारण उठना, बैठना, बोलना, बड़ों का आदर सत्कार, माता-पिता, गुरुजनों के सम्मान में रुचि नहीं रखता है । इन सबका कारण माता-पिता के पास  समय अभाव एवं संयुक्त परिवार का कम होना है। प्रत्येक माता पिता यह उम्मीद करते है कि उनका बच्चा बेहतर से बेहतर शिक्षा ग्रहण करे, अच्छे संस्कार स्कूल में शिक्षक भी सिखाएं। विषय ज्ञान के लिए विद्यार्थी उत्तरदायित्व हैं लेकिन संस्कारों, वास्तविक प्रयोगशाला तो घर एवं परिवार हैं जहां बच्चों के व्यवहार एवं संस्कारों का वास्तविक प्रयोग होता है। आज का शिक्षक एवं छात्र दोनों अंकों के खेल में अधिक व्यस्त हो गए हैं। उनका एक ही लक्ष्य सर्वाधिक अंक लाकर कुछ बनने का होता है। अध्यापक भी छात्रों के सर्वांगीण विकास के स्थान पर मानसिक विकास पर केंद्रीत होता है। इसी भागदौड़ में जीवन के अच्छा नागरिक या अच्छा इंसान बनाने की पहल से  अछूते रह जाते हैं। पुराने समय में शिक्षक एक ईश्वर की तरह वास्तविक रूप से पूज्यनीय होते थे। आज इस स्तर में बहुत ही जयादा  बदलाव आया हुआ है। इसके लिए हम सभी समाज के लोग जिम्मेदार हैं। आज अभिभावक शिक्षक पर अपने बच्चों से ज्यादा भरोसा नहीं करता पहले शिक्षक की बात पर विश्वास किया जाता था। पहले माता पिता अपने से ज्यादा शिक्षक को बच्चों का शुभ¨चतक मानते थे। तो पालक कृपया ध्यान दे । 

पालको को चाहिए की  बच्चों को शुरू से ही उनकी जिम्मेदारियों के प्रति प्रेरित करना चाहिए। इसकी शुरूआत अपने घर से की जानी चाहिए। बच्चों को अपने घर की छोटी छोटी जिम्मेदारियां सौंपनी चाहिए जैसे पढ़ाई से फुर्सत के दौरान छोटे मोटे सामान लाने के लिए बाजार जाने, घर में मेहमान आते हैं तो जलपान आदि परोसने, माता पिता के साथ बागवानी में हाथ बंटाने के लिए प्रेरित करते रहना  चाहिए। इससे बड़े होने पर वे अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझ सकेंगे। इससे उनमें घर व्यवहार की समझ भी  विकसित होगी।किसी कार्य के दौरान गलती होने पर उन्हें डांटने के बजाय समझाते हुए प्रेरित किया जाना  चाहिए। कई बार अभिभावक बच्चों को नालायक या बिल्कुल ही नाकारा मानने लगते हैं। इससे बच्चों के मानस पटल पर नकारात्मक  प्रभाव पड़ता है। हमें इससे बचना चाहिए। यदि  बच्चे गलती करें तो भी उनके काम की तारीफ करते हुए उनकी कमियों  को बताना चाहिए ताकि वे अगली बार उन गलतियों को नहीं दोहराएं। बच्चों को अपना जीवन जीने के लिए प्रेरित करते रहना  चाहिए। पालको दायित्व केवल उन्हें मार्गदर्शन करने का होना चाहिए।  

एक बात का और ध्यान रखें की बच्चे जब जिद पर उत्तारू हो जाते हैं तब पालकगण को शांति अपनानी चाहिए। शांति अपनाने का मतलब केवल मुंह बंद रखना नहीं अपितु अपने मन को शांत रखना है । चेहरे पर बिलकुल भी गुस्से का भाव न रखते हुए चेहरा शांत दिखे। स्वयं को सुदृढ़ रखें। कई  बार बच्चों की जिद के लिए पालकगण ही जिम्मेदार होते हैं।