चिकित्सा शिक्षा का वर्तमान और भविष्य

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भविष्य में, चिकित्सा शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन का मार्ग राष्ट्रीय आईसीएस मेडिकल आयोग -2019 (राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग) के प्रशिक्षण के माध्यम से खोला गया है। यह बिल लोकसभा पारित किया  हैं। सबसे पहले, राज्यसभा में पारित  हो चूका है । इस बिल के अस्तित्व में प्रवेश करने के बाद, एनएमसी 63 वर्षीय भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) को प्रतिस्थापित करेगा। अब, यह कानून चिकित्सा शिक्षा, चिकित्सा वृत्ति और चिकित्सा संस्थानों के विकास और विनियमन का आधार बन जाएगा। पिछले साल, सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे एमसीआई को निलंबित कर दिया और चिकित्सा शिक्षा के नियंत्रण के लिए निदेशक मंडल का गठन किया। सरकार बताती है कि इस कानून के गठन के बाद, इंस्पेक्टर राज  चिकित्सा क्षेत्र में समाप्त हो जाएंगे। 16 वीं लोक सभा में, जब यह बिल लाया गया है, तो एमसीआई के तहत, देश के डॉक्टरों की हड़ताल हुई  थी  और कुछ समस्याओं में बदलावों के लिए कहा है। सरकार ने इस बिल के प्रारूप में बदलाव किए हैं, जो एलोपैथी की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करता है ।

इस विधेयक में  चिकित्सा शिक्षा में एकरूपता प्रदान करने की कोशिश की गई है। अब, एमबीबीएस में प्रवेश करने के लिए, देश में केवल एक “राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा” (एनआईआईटी) होगी। एमबीबीएस के पिछले वर्ष के परिणाम चिकित्सा के तीसरे चक्र पाठ्यक्रम में प्रवेश करने के लिए बनाए गए थे। जो छात्र देश के बाहर से एमबीबीएस लाएंगे, पीजी के अहंकार के लिए “राष्ट्रीय आउटपुट टेस्ट” (निम्नलिखित) पास करना अनिवार्य है। एमबीबीएस और पीजी पाठ्यक्रमों में सीटों के 50% कर्तव्य को अलग से अलग किया गया है। अब तक, निजी मेडिकल कॉलेजों में 50% सीटें भरना आवश्यक था। अब,  आश्वासन दिया है कि सरकार लगभग 80,000 एमबीबी सीटों की लगभग 60,000 सीटों की फीस निर्धारित करेगी। इन सीटों की आधा सीट सरकारी कॉलेजों की है। किसकी लागत बहुत कम है। 20,000 शेष सीटों के लिए फीस परिभाषित, राज्य सरकारें निजी मेडिकल कॉलेजों से निपटने में सक्षम हो सकती हैं।

विधेयक में ऐसे किसी सेतु पाठ्यक्रम की बात नहीं की गई है, जिसे पूरा करके  कोई भी छात्र आयुर्वेद, हौम्योपैथी और यूनानी चिकित्सक सीधे-सीधे संपूर्ण ऐलौपैथी चिकित्सा करने लग जाएं. एमसीआई को सबसे ज्यादा ऐतराज इसी बिंदु पर था. बावजूद इन चिकित्सकों को प्राथमिक स्तर पर ऐलौपैथी की चिकित्सा करने की अनुमति आयोग से सामुदायिक स्वास्थ्य प्रदाता लाइसेंस हासिल करने के बाद मिल जाएगी. लेकिन इन्हें प्राथमिक स्तर पर रोगी को कुछ जीवन रक्षक दवाएं देकर मरीज को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अथवा जिला चिकित्सालय में भेजना जरूरी होगा. यह एक तरह से झोलाछाप कहे जाने वाले डॉक्टरों को सीमित दायरे में चिकित्सा करने की छूट का लाइसेंस है. इसके साथ ही राज्य सरकारों को छूट होगी कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर जरूरत के अनुसार चिकित्सकों के अलावा बीएससी नर्सिंग, बीडीएस और बी फार्मा डिग्री धारकों को चिकित्सा की सुविधा दे सकती है.

इस कानून को लाना इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से जुड़ी संसद की स्थाई समिति ने अपनी 92वीं रिपोर्ट में एमसीआई की आलोचना करते हुए कहा था कि ‘सक्षम चिकित्सक तैयार करने और गुणवत्ता बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी को एमसीआई ठीक से नहीं निभा रही है. नतीजतन, गुणवत्ता चिकित्सा शिक्षा अपने निम्न स्तर तक पहुंच गई है। यह शिक्षा वर्तमान प्रणाली में पेशेवर डॉक्टरों को सही ढंग से तैयार करने में विफल रही है। राज्य स्वास्थ्य की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी नहीं हुई हैं, क्योंकि शिक्षा और चिकित्सा पाठ्यक्रम हमारी स्वास्थ्य प्रणाली के अनुसार तैयार नहीं किए गए हैं। इन विश्वविद्यालयों से सीखने वाले कई एमबीबीएस डॉक्टर भी खुद को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और गरीबों के लिए जिला अस्पतालों पर जाने के लिए  विचार करते हैं। तो इस बिल को लाया जाना चाहिए था ।

 

 इस विधेयक को लाने का उद्देश्य इस पेशे को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों के अनैतिक गठजोड़ को तोड़ना भी है. मौजूदा व्यवस्था के अनुसार कायदे से उन्हीं छात्रों के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलना चाहिए, जो सीटों की संख्या के अनुसार नीट परीक्षा से चयनित हुए होते हैं. हालांकि अब नीट की जगह छात्रों की   नेक्स्ट परीक्षा लेगी. फिलहाल आलम है कि जो छात्र दो लाख से भी ऊपर की रैंक में है, उसे भी धन के बूते प्रवेश मिल जाता है. यह स्थिति इसलिए बनी हुई है, क्योंकि जो मेधावी छात्र निजी कॉलेज की शुल्क अदा करने में सक्षम नहीं हैं, वह मजबूरीवश अपनी सीट छोड़ देते हैं. बाद में इसी सीट को निचली श्रेणी में स्थान प्राप्त छात्र खरीदकर प्रवेश पा जाते हैं. इस सीट की कीमत 60 लाख से एक करोड़ तक होती है. जो छात्र एमबीबीबीएस में प्रवेश की पात्रता नहीं रखते हैं, वे अपने अभिभावकों की अनैतिक कमाई के बूते, इस पवित्र और जिम्मेदार पेशे के पात्र बन जाते हैं. ऐसे में इनकी अपने दायित्व के प्रति कोई नैतिक प्रतिबद्धता नहीं होती है. पैसा कमाना ही इनका एकमात्र लक्ष्य रह जाता है. अपने बच्चों को हर हाल में मेडिकल और आईटी कॉलेजों में प्रवेश की महत्वाकांक्षा रखने वाले पालक यही तरीका अपनाते हैं.।

शुल्क में जमीं आसमान का  अंतर है  देश के सरकारी कॉलेजों की एक साल की शुल्क महज 4 लाख है, जबकि निजी विश्व-विद्यालय और महाविद्यालयों में यही शुल्क 64 लाख है. यही धांधली एनआरआई और अल्पसंख्यक कोटे के छात्रों के साथ बरती जा रही है. एमडी में प्रवेश के लिए निजी संस्थानों में जो प्रबंधन के अधिकार क्षेत्र और अनुदान आधारित सीटें हैं, उनमें प्रवेश शुल्क की राशि 2 करोड़ से 5 करोड़ है. इसके बावजूद सामान्य प्रतिभाशाली छात्र के लिए एमबीबीएस परीक्षा कठिन बनी हुई है. यही वजह है कि एमबीबीएस और इससे जुड़े विषयों में पीजी में प्रवेश पाना बहुत कठिन है. एमबीबीएस में कुल 67,218 सीटें हैं, जो अब बढ़कर 80,000 हो जाएंगी. इसलिए अब उम्मीद की जा सकती है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का जो 1000 की आबादी पर एक डॉक्टर की मौजदूगी अनिवार्य है, वह लक्ष्य आने वाले कुछ समय में पूरा हो जाएगा.।