आखिर कब खत्म होगा शिक्षा का व्यापार -Parents assembly.com-

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शिक्षा का व्यापार

WHAT TO D शिक्षा की मांग बढ़ने से शिक्षा का व्यापार भी बढ़ते जा रहा है| अच्छी शिक्षा लगातार महंगी शिक्षा हो रही है। शिक्षा की मांग बढ़ने से शिक्षा का व्यापार भी बढ़ते जा रहा है|सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बजाय निजी स्कूल-कॉलेजों को तरजीह देने वाले मां-बाप हमेशा यह रोना रोते हैं कि इतनी महंगाई में महंगी शिक्षा का खर्च उठाना भारी पड़ने लगा है। पर इसका एक विरोधाभास भी है। बहुत से लोगबाग अपने बच्चों को विदेशी डिग्री के लिए बाहर भेजना पसंद कर रहे हैं और इसके वास्ते समान डिग्री या कोर्स के लिए दस गुना ज़्यादा खर्च खुशी-खुशी उठाने को तैयार हैं। हाल में पता चला है कि गत वर्ष जुलाई में भारतीय अभिभावकों ने विदेश में पढ़ रहे अपने बच्चों को मेंटेनेंस के नाम पर ही 11.39 करोड़ डॉलर भेजे जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। बीते एक साल में इस रकम में छह गुने का उछाल हालांकि कुछ और संदेहों को जन्म दे रहा है। जैसे, इसमें आयकर विभाग की नजर बचा कर रकम विदेश भेजने का कोई खेल हो सकता है, पर यह तो तय है कि विदेशी शिक्षा का मोह कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह एक नई चुनौती है, जो सवा साल से देश में ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में तो उनके आह्वान की हवा निकालने वाली मानसिकता के ही दर्शन हो रहे हैं।
(शिक्षा का व्यापार)

कई पश्चिमी देशों में शिक्षा पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता है। हो सकता है कुछ जगह किताबें-कापियां खुद खरीदनी पड़ती हों मगर स्कूलों में फीस या चंदे के रूप में प्रवेश शुल्क, परीक्षा शुल्क आदि वसूल नहीं किया जाता।  इसके विपरीत भारत में स्थिति कुछ अलग है। हमारे यंहा सबसे बड़ी समस्या है और हमेशा की तरह वह है पैसा! दरअसल, शिक्षा बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है! एक विशाल, भ्रष्ट व्यापार!

 

हमारे यहाँ सरकारी स्कूल हैं, जो मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं-वहाँ स्कूल फीस नहीं लगती और सरकारें लम्बे-चौड़े इश्तहार प्रकाशित करती हैं कि वहाँ बच्चों को शिक्षा के अलावा मुफ्त भोजन भी मुहैया कराया जाता है-लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा वहाँ प्रदान की जाती है वह अक्सर बिलकुल निरुपयोगी और घटिया होती है! वहाँ अक्सर शिक्षक पढ़ाने ही नहीं आते और जब आते भी हैं तो आपस में बैठकर गपशप करते रहते हैं। कई जगह स्कूलों का इस्तेमाल कबाड़ख़ाने की तरह किया जाता है और यहाँ तक कि जानवर बाँधने के लिए भी उनका इस्तेमाल होता देखा गया है! कहीं-कहीं शिक्षक अपने किसी स्थानापन्न को स्कूल भेज देते हैं, जो कम पढ़ा-लिखा और अयोग्य होता है और जिसे वे अपनी पक्की, सरकारी तनख्वाह में से कुछ रुपया दे देते हैं। इस दौरान शिक्षक अपने किसी निजी व्यापार में लगे होते हैं और इस तरह एक साथ दो स्रोतों से पैसा कमाते हैं। यह है सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का हाल! किसी को कोई परवाह ही नहीं है!

(शिक्षा का व्यापार)

स्वाभाविक ही वे अपढ़ माता-पिता भी, जो आर्थिक रूप से भी कमज़ोर होते हैं, इस स्थिति से अनभिज्ञ नहीं होते। उन्होंने जीवन में कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा मगर वे भी देखते-समझते हैं कि उनके लड़के-लड़कियाँ एक के बाद एक परीक्षाएँ पास करते हुए अगली कक्षाओं में पहुँचते जा रहे हैं मगर अपने नाम तक लिख नहीं पाते। हिन्दी में लिखा छोटा-मोटा वाक्य भी ठीक से पढ़ नहीं पाते!

दूसरी तरफ निजी  शिक्षा के नाम पर निजी संस्थाओं ने लूट मचा कर रखी है निजी संस्थाओं द्वारा औपचारिक रूप से वितरित परिचय-पुस्तिकाओं में लिखा ही नहीं होता: अनौपचारिक प्रवेश-शुल्क, स्कूल को अनिवार्य रूप से दिया जाने वाला चन्दा, बच्चे को प्रवेश-प्रक्रिया में उत्तीर्ण कराने और उसका प्रवेश सुनिश्चित कराने के लिए दी जाने वाली रिश्वत! सामान्यतः यह रकम कुल मिलाकर 700 से 850 यू एस डॉलर यानी करीब 40 से 50 हजार रुपयों तक होती है और अगर आप अपने बच्चे से प्रेम करते हैं और आपके लिए इतनी रकम खर्च करना सम्भव है तो आप यह सौदा मंज़ूर कर लेते हैं।

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