प्राचीन भारतीय शिक्षा पर विदेशी शिक्षा का प्रभाव

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भारतीय शिक्षा का इतिहास भी भारतीय सभ्यता और संस्कार का भी इतिहास है। भारतीय समाज के विकास और उसमें होने वाले परिवर्तनों की रूपरेखा में हम शिक्षा की जगह और उसकी भूमिका को भी निरंतर विकासशील पाते हैं। सूत्रकाल तथा लोकायत के बीच शिक्षा की सार्वजनिक प्रणाली के पश्चात हम बौद्धकालीन शिक्षा को निरंतर भौतिक तथा सामाजिक प्रतिबद्धता से परिपूर्ण होते देखते हैं। बौद्धकाल में स्त्रियों और शूद्रों को भी शिक्षा की मुख्य धारा में सम्मिलित किया जाना प्रारम्भ किया गया।

प्राचीन भारत में जिस शिक्षा व्यवस्था का निर्माण किया गया था वह समकालीन विश्व की शिक्षा व्यवस्था से समुन्नत व उत्कृष्ट थी लेकिन कालान्तर में भारतीय शिक्षा का व्यवस्था ह्रास हुआ। जब यंहा पर विदेशी शासन रहा तब विदेशियों ने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था को उस अनुपात में विकसित नहीं किया, जिस अनुपात में होना चाहिए था। अपने संक्रमण काल में भारतीय शिक्षा को कई चुनौतियों व घोर समस्याओं का सामना करना पड़ा था। आज भी ये चुनौतियाँ व समस्याएँ हमारे सामने हैं जिनसे हमे दो-दो हाथ करना है।

स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही भारतीय शिक्षा को लेकर अनेक काफी जद्दोजहद चलती रही। स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने सार्वजनिक शिक्षा के विस्तार के‍लिए अनेक प्रयास किए. यह और बात है कि इन प्रयासों की अनेक खामियाँ भी सामने आई हैं जिन्हें दूर करने का प्रयास अभी भी किया जा रहा है।

२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना स्वयं मैकाले के शब्दों में

मैं भारत के कोने-कोने में घुमा हूँ ,मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो, जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है, इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं, की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे, जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है।

और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डालें, क्युकी अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी बिदेशी और अंग्रेज़ी है वह अच्छा है, और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है, तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते हैं।एक पूर्णरूप से गुलाम भारत ” ।

जब आपकी मानसिकता गुलाम हो जाती है तो आप भी ग़ुलाम हो जाते है क्योंकि आपको किसी का अनुसरण करने की आदत हो जाती है।

कई सेकुलर लोग उपर्युक्त भाषण की पंक्तियों को कपोल कल्पित कल्पना मानते है अगर ये कपोल कल्पित पंक्तिया है, तो इन काल्पनिक पंक्तियों का कार्यान्वयन कैसे हुआ? सेकुलर , मैकाले की गद्दार औलादे इस प्रश्न पर बगले झाकती दिखती है और कार्यान्वयन कुछ इस तरह हुआ की आज भी मैकाले शिक्षा व्यवस्था  की औलादे छद्म अपने छद्म सेकुलर भेष में यत्र तत्र बिखरी पड़ी हैं ।

१८२५ के लगभग जब ईस्ट इंडिया कंपनी वितीय रूप से संक्रमण काल से गुजर रही थी और ये संकट उसे दिवालियेपन की कगार पर पहुंचा सकता था कम्पनी का काम करने के लिए उसे ब्रिटेन के स्नातक और कर्मचारी अब उसे महंगे पड़ने लगे थे । १८२८ में जिस समय गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक भारत आया और जिसने लागत घटने के उद्देश्य से अब प्रसाशन में भारतीय लोगों के प्रवेश के लिए चार्टर एक्ट में एक प्रावधान जुड़वाया की सरकारी नौकरी में धर्म जाती या मूल का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। यहाँ से मैकाले का भारत में आने का रास्ता खुला और फिर शुरू हुवा भारत की प्राचीन शिक्षा का विनाश का समय । उसने पूरी तरह से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को ख़तम करने और अंग्रेजी (जिसे हम मैकाले शिक्षा व्यवस्था भी कहते है) शिक्षा व्यवस्था को लागू करने का प्रारूप तैयार किया।

तथा भारत पर थोप दी अपनी शिक्षा निति ।

विडम्बना ये हुए की आजादी मिलते-मिलते एक बड़ा वर्ग इन गुलामों का बन गया जो की अब स्वतंत्रता संघर्ष भी कर रहा था यहाँ भी मैकाले शिक्षा व्यवस्था की चाल कामयाब हुई अंग्रेजों ने जब ये देखा कि अब भारत में रहना असंभव है तो चंद मैकाले और अंग्रेज़ी के गुलामों को सत्ता हस्तांतरण कर के ब्रिटेन चले गए उनका मकसद पूरा हो चुका था । अंग्रेज गए मगर उनकी नीतियों की गुलामी अब आने वाली पीढ़ियों को करनी थी ।और उसका कार्यान्वयन करने के लिए थे कुछ हिन्दुस्तानी भेष में बौधिक और वैचारिक रूप से अंग्रेज नेता और कहलाये देश के रखवाले ।

इसका एक ही उत्तर है हमे वर्तमान परिवेश में हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित उच्च आदर्शों को पुनः स्थापित करना होगा तथा हमें विवेकानंद का “स्व” और क्रांतिकारियों का देश दोनों को जोड़ कर स्वदेशी की कल्पना को मूर्त रूप देने का प्रयास करना ही होगा चाहे जो भाषा हो या खान पान या रहन सहन पोशाक पहनो । अगर मैकाले की व्योस्था को तोड़ने के लिए मैकाले की व्योस्था में जाना पड़े तो जाएँ पर भारतीय संस्कृति और आदर्श को पुनः जीवित करे  ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करें । कुछ नई विचारधारा अपनाना ग़लत बात नहीं है लेकिन पूर्णतः किसी की मानसिक गुलामी करना ग़लत है।