दुनिया को प्रबंधन की शिक्षा कृष्ण से लेना चाहिए

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भगवान  कृष्ण का जीवन मनुष्य जाति के लिए प्रेरणा का स्रोत है। कृष्ण ने अपने जीवन में ऐसी अनेक लीलाएं की, जिसमें लाइफ मैनेजमेंट के बहुत ही गहरे सूत्र छिपे हुवे हैं। आज हम आपको भगवान कृष्ण के जीवन से जुड़ी कुछ बड़े तथा रोचक किस्से तथा उनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र भी बताएंगे।

नवसृजन और जनकल्याण के प्रणेता भगवान कृष्ण की अनेक छवियाँ भारतीय जनमानस से युगो से जुडी हुई हैं। श्रीकृष्ण के स्मरणमात्र से ही कभी बाललीला करते तो कभी रासलीला रचाते या कालिया दमन करते श्रीकृष्ण या फिर कुरुक्षेत्र के सारथी श्रीकृष्ण की छवि एकसाथ प्रकट हो जाती है। श्रीकृष्ण में सबसे खास बात यह है कि उनका दर्शन व्यावहारिक था। यही वजह है कि वे दुनियां के पहले मैनेजमेंट गुरु भी कहलाते हैं।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण की कुशल रणप्रबंधन नीति ही पांडवों के जीत का कारण बनी। उनका दर्शन व्यावहारिक था तथा जीवन को यथार्थ में देखने की उनकी दृष्टि थी। वे हमेशा काल तथा परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेते थे, इस लिहाज से उनके प्रबंधन नीति की आज भी प्रासंगिकता है। गृह नीति हो या विदेश नीति अथवा आर्थिक नीति, उनके दर्शन में वह सबकुछ मौजूद है जो एक देश के सफल संचालन के लिए ज़रूरी है।

श्रीकृष्ण के प्रबंधन नीति की खासियत यह है कि उसमे भावना और विवेक दोनों एक दूसरे का पूरक है। मैनेजमेंट गुरु श्रीकृष्ण का वह व्यावहारिक कौशल ही था कि अत्याचारी कंस को सबसे पहले आर्थिक रूप से कमजोर किया गया और फिर उसका वध किया। पूरे महाभारत युद्ध के दौरान कहीं भी श्रीकृष्ण उहापोह की स्थिति में नजर नहीं आये, उलटे जब अर्जुन ने भाई-बंधू की बात करते हुए युद्ध के प्रति झिझक दिखाई तो श्रीकृष्ण ने उन्हें धर्म और अधर्म का पाठ पढ़ाया।

कृष्ण हमेशा प्रकृति के अनुसार निर्णय लेते थे इसलिए उनके आसपास के लोगों को उनके निर्णय के साथ सामंजस्य स्थापित करने में कभी परेशानी महसूस नहीं हुई, मतलब वे सर्वमान्य नीति के प्रणेता भी थे, आज पूरे विश्व में नीतियों का संकट है। ऐसे में श्रीकृष्ण के दर्शन और प्रबंधन की प्रासंगिकता नजर आती है जो निर्विवाद, सटीक और व्यावहारिक थे। विचार के स्तर पर भगवन श्रीकृष्ण कितने स्पष्ट थे उसका सबसे बेहतर उदाहरण कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया गीता का उपदेश है। यही उन्होंने अपने अवतार का प्रयोजन भी बताया था। उन्होंने उस समय लोगों पर हो रहे अत्याचार को मिटाया और एक नए युग का सूत्रपात किया। यही वजह है कि वे जगतगुरु के रूप में सारे संसार के पथ-प्रदर्शक हैं।

भगवान कृष्ण कॉमन इकोनॉमी अर्थव्यवस्था के पैरोकार भी थे, गाँव में आर्थिक खुशहाली और पर्यावरण प्रबंधन के लिए उन्होंने गोधन की महत्ता को आमलोगों के बीच स्थापित किया। लेकिन आज पूरे देश के साथ-साथ कोसी का इलाका भी पशुधन संकट से जूझ रहा है। कहते हैं कि कभी इस इलाके में दूध की नदियाँ बहती थी, लेकिन आज गली-गली में शराब की नदियाँ बह रही है। संक्रमण और तथाकथित सुशासन के इस दौर में एक बार फिर श्रीकृष्ण के प्रप्रबंधन और दर्शन की ज़रूरत महसूस हो रही है।क्योंकि खुद कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में कहा था “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम्”    ।

 

 भीष्म के कहने पर भगवान कृष्ण का नाम अग्रपूजा के लिए तय हुआ।

लगभग सभी राजा इसके लिए तैयार थे, लेकिन स्वयं कृष्ण की बुआ का बेटा शिशुपाल इसके लिए तैयार नहीं था। उसका कहना था कि राजाओं की सभा में एक ग्वाले की अग्रपूजा करना सभी राजाओं का अपमान करने जैसा है। उसने कृष्ण को गालियां देना शुरू कर दिया। शिशुपाल के जन्म के समय ही यह भविष्यवाणी हो चुकी थी कि इसकी मौत कृष्ण के हाथों होगी, लेकिन कृष्ण ने अपनी बुआ को ये भरोसा दिलाया था कि वे सौ बार शिशुपाल से अपना अपमान सहन करेंगे।

इसके बाद ही उसका वध करेंगे। सभा में शिशुपाल ने सारी मर्यादाएं तोड़ दी और अनेक बार कृष्ण का अपमान किया। यंहा पर आप कृष्ण के धैर्य का दर्शन करतें हैं। सौ बार पूरा होते ही कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध कर दिया। चक्र के प्रयोग से उनकी उंगली कट गई और उसमें से खून बहने लगा। तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। उस समय कृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया था कि इस कपड़े के एक-एक धागे का कर्ज वे समय आने पर चुकाएंगे। यह ऋण उन्होंने चीरहरण के समय चुकाया।

लाइफ मैनेजमेंट-अच्छा काम भविष्य के फिक्स डिपॉजिट की तरह होता है, जो समय आने पर आपको पूरे ब्याज सहित वापस मिलता है।

एक बार ब्रजवासीयो ने कृष्ण की बात को मान कर इंद्र के यज्ञ की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने पूरे ब्रजमंडल पर भयंकर बरसात शुरू कर दी। ब्रजवासी डर गए. नदियां, तालाब सभी उफन गए. बाढ़ आ गई. ब्रज डूबने लगा और लोगों के प्राण संकट में आ गए. सभी ने कृष्ण से कहा कि देखो तुम्हारे कहने पर इंद्र को नाराज किया तो उसने कैसा प्रलय मचा दिया है। अब ये गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा क्या? कृष्ण ने कहा–हां, यही गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा। कृष्ण ने अपने दाहिने हाथ की छोटी उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया। सारे गांव वाले उसके नीचे आ गए ।

वे बारिश की बौछारों से बच गए. भगवान ने ग्वालों से कहा कि सभी मेरी तरह गोवर्धन को उठाने में सहायता करो। अपनी-अपनी लाठियों का सहारा दो। ग्वालों ने अपनी लाठियां गोवर्धन से टिका दी। इंद्र को हार माननी पड़ी। उसका अहंकार नष्ट हो गया। वह कृष्ण की शरण में आ गया। भगवान ने उसे समझाया कि अपने कर्तव्यों के पालन के लिए किसी प्रतिफल की आशा नहीं करनी चाहिए. जो हमारा कर्तव्य है, उसे बिना किसी लालच के पूरा करना चाहिए ।

लाइफ मैनेजमेंट- कृष्ण ने यहाँ सीधे रूप से लाइफ मैनेजमेंट के तीन सूत्र दिए हैं। पहला यह कि भ्रष्टाचार बढ़ाने में दो पक्षों का हाथ होता है। एक जो कर्तव्यों के पालन के लिए अनुचित लाभ की मांग करता है, दूसरा वह पक्ष जो ऐसी मांगों पर बिना विचार और विरोध के लाभ पहुंचाने का काम करता है। इंद्र मेघों का राजा है, लेकिन पानी बरसाना उसका कर्तव्य है। इसके लिए उसकी पूजा की जाए या उसके लिए यज्ञ किए जाएं, आवश्यक नहीं है। अनुचित मांगों पर विरोध ज़रूरी है। जो लोग किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को उसके कर्तव्य की पूर्ति के लिए रिश्वत देते हैं तो वे भी भ्रष्टाचार फैलाने के दोषी हैं।

लाइफ मैनेजमेंट का दूसरा सूत्र है, प्राकृतिक संसाधनों के सम्मान का। पहाड़, नदी, वन, पेड़-पौधे ये सब हमारे रक्षक हैं, मित्र हैं। हमें इनका सम्मान करना चाहिए, क्योंकि ये हमारे लिए कई कष्ट झेलते हैं, लेकिन हमेशा हमारी सहायता करते हैं। उनके सम्मान से ही प्रकृति का संतुलन बना रहेगा।

लाइफ मैनेजमेंट का तीसरा सूत्र है, अपनी जिम्मेदारी खुद उठाने का। भगवान ने जब गोवर्धन पर्वत को उठाया तो ग्वालों से भी अपनी लाठियों का सहारा देने के लिए कहा, जबकि सारा भार खुद श्रीकृष्ण ने उठा रखा था। भगवान समझा रहे हैं कि तुम्हारी रक्षा की सारी जिम्मेदारी मेरी ही है, लेकिन फिर भी तुम्हें अपने प्रयास खुद करने होंगे। सिर्फ़ मेरे भरोसे रहने से काम नहीं चलेगा, कर्म तो तुम्हें ही करने होंगे। अगर पूरी तरह से भगवान के भरोसे बैठ जाएंगे तो आत्मविश्वास खो जाएगा। फिर हर मुसीबत में भगवान को ही याद करेंगे।

 

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